इक ज़िंदगी जो पहले थी
थोड़ी हँसती थी थोड़ी खिलखिलाती थी
थोड़ा सा गुस्सा होती थी
पर जल्दी से मान जाती थी
आँखो मे मस्ती लिए
जब मेरे पास आती थी
कानो मे फुसफुसा के कूछ
झट से भाग जाती थी
अब तस्वीरें रह गई हैं
उनमे ही बस्ती है वो
देखता हूँ जब उन्हे
मुझपे ही हँसने लगती है वो
ज़िंदगी अब जो मेरी है
वो थोड़ी उदास है
कैसे मिलूं उसे में
उस ज़िंदगी से जो पहले थी.....

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