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Monday, October 1, 2012

dhool khati kitabein


धूल खाती किताबें आले मे रखी हैं
कुछ बातें लिए कुछ यादें समेटे, जाने कब से वहीं हैं

आज अचानक ही हाथ बढ़ गया उनकी तरफ
के शायद कोई खोया पन्ना मिल जाए

काग़ज़ों को पलटने से
क्या पता कोई लम्हा वापस मिल जाए

पलट के देखा जब उन पन्नो को
मिले कुछ वक़्त के खोए पल
कुछ हसीन तो कुछ पागल

याद करके उन्हे बंद कर दी वो किताब अब
और फिर रख दिया उसे उन्ही धूल वाली किताबों के साथ

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