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Tuesday, October 2, 2012

rahein


ज़िंदगी के राहों मे अकेले रह गये हम
चलते चलते ना जाने कब थक के गिर गये हम

देखा जब उठ के पीछे मुड़ के

उन लम्हो को, उन यादों को, कुछ खुशिओं को, कुछ बहारों को,

अश्कों के मैखनों मे खो गये हम


कोई साथ ना रहा, शायद हमने पीछे छोड़ दिया

जो रिश्ते थे अच्छे, उन्हे कच्चा समझ के तोड़ दिया....

पर अब होता है अफ़सोस उन्ही बातों, यादों, मुलाक़ातों पे

के क्यू ना समझ पाया था कीमत जब साथ सब थे

ज़िंदगी के राहों मे अकेले रह गये हम

चलते चलते ना जाने कब थक के गिर गये हम

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